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लॉकडाउन में बढ़ी पारिवारिक चुनौतियां, सामाजिक समरसता से कम हुए तनाव, कामकाज में मदद के जरिए प्रेमभाव भी बढ़ा

संकट के समय परिवार से बड़ा कुछ नहीं, अपने ही आ रहे अपनों के काम, रूपये और ओहदे से बड़ा बना संबंध

जनआवाज, लखनऊ, 27 अप्रैल 2020.

एक बात तो साफ है कि कोरोना से दुनिया सहमी हुई है, सभी लॉकडाउन में हैं, और इस महामारी से निपटने में पूरी सतर्कता बरत रहे हैं. लोग घरों में कामकाज बंद है, एक तरफ जहां लोगों को परिवार के साथ रहने को मिल रहा है, सब साथ मिलकर घर के कामों में एक दूसरे का हाथ बंटा रहे हैं, वहीं कुछ घरों में ऐसा भी है कि वहां सास बहू में मां बाप की बच्चों से और पति पत्नी की आपस में नोकझोंक भी बनी हुई है, आपस में सामंजस्य ना बैठने से लोग तनाव में भी है, लोगों के तनाव को क्या कहें कुछ लोग तो इससे भी तनाव में हैं कि उनकी दाढ़ी और बाल नहीं कट पा रहे हैं, कपड़े नहीं प्रेस हो पा रहे, दूध और सब्जी के लिए जाना पड़ रहा है, घर में किचन के कामों में हाथ बंटाना पड़ रहा है।

आखिर लॉकडाउन में सामाजिक ताने बाने पर क्या असर पड़ रहा है और आने वाले दिनों में किस तरह के बदलाव लोगों के नजरिए और उनकी जीवनशैली पर पड़ेगा, इसे जानने के लिए हमने बात की कुछ समाजशास्त्रियों से, आइए जानते हैं कि उनकी क्या राय है,

1–तो सबसे पहले सुनते हैं कि क्याकह रहे हैं लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के हेड प्रोफेसर डीआर साहू-

2- लखनऊ के ही डीएवी कॉलेज के प्रोफसर मणींद्र तिवारी की मानें तो इस लॉकडाउन के सापेक्ष सामाजिक परिणाम सामने आ रहे हैं।

3- एपी सेन गर्ल्स पीजी कॉलेज की प्रोफेसर श्वेता तिवारी का मानना है कि ऐसे हालात में जाहिर है समाज में समरसता तो आती है पर विघटनकारी सरोकारों से कतई इनकार नहीं किया जा सकता।

 

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