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नेताओं को भी टैक्सपेयर होना चाहिए-संसद और न्यायपालिका ले ठोस फैसला- तभी भलीभूत होगा एक देश एक कानून का मतलब

130 करोड़ में महज 5 फीसदी हैं टैक्सपेयर जबकि 80 करोड़ हैं गरीब, किसान और ईमानदार टैक्सपेयर ही चला रहे देश

लखनऊ, 30 जून 2020. संजय श्रीवास्तव

कहते हैं बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी। जी हां देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज शाम 4 बजे कोरोना को लेकर 6ठी बार देश को संबोधित किया। करीब 16 मिनट के अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने एक तरफ जहां कोरोना को लेकर लोगों को आगाह किया वहीं देश के 80 करोड़ लोगों को अगले 5 माह तक मुफ्त राशन दिए जाने का ऐलान किया, पीएम मोदी ने देश के किसानों और आयकरदाताओं का भी शुक्रिया अदा किया वजह उनकी मेहनत की कमाई से ही लोगों का पेट भी भर रहा है और कमाई पर ईमानदारी से दिए टैक्स से सरकारी मदद भी जारी है।बात जब आयकरदाताओं की होती है तो प्रधानमंत्री के संबोधन से साफ हो जाता है कि देश की 130 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ लोग तो गरीब हैं जो सरकारी राशन और मदद के ही भरोसे हैं।अब बचे 50 करोड़ लोग इनमें से सरकारी आंकड़ो के मुताबिक केवल लगभग 5 प्रतिशत लोग ही आयकरदाता हैं, बाकी के 45 करोड़ के बारे में अभी सरकार को ही नहीं पता तो भला मै कैसे स्पष्ट कर सकता हूं। इन आयकरदाताओं में क्लर्क से लेकर आईएएसअफसर, व्यापारी-व्यवसायी, उद्योगपति तो शामिल हैं पर हमारे देश के वो नेता भी आयकरदाताओं की श्रेणी से बाहर हैं जो सरकारी या निजी बड़े बड़े एसी  बंगलों में रहते हैं, सरकारी या निजी लग्ज़री गाड़ियों के काफिलों से चलते हैं, तमाम तो ऐसे हैं जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी भी फाइव स्टार ही होती है, यही नहीं इनमें से ज्यादार हमारे एमपी और एमएलए हैं अब उनमें से कोई मिनिस्टर हो गया है तो समझो सोने पे सुहागा हो गया है है उनकी लाइफ में।हमारे नेता आखिर आयकर की श्रेणी में क्यों नहीं आते इस पर लिखने बैठा तो गूगल देवता पर थोड़ा सर्च किया तो पता लगा कि हमारे देश के सांसदों पर करीब 2 लाख 80 हजार रूपए प्रति माह का खर्च सरकार वहन करती है। 2015-16 में एक अध्ययन के मुताबिक 543 लोकसभा सांसदों पर लगभग 176 करोड़ रूपया खर्च हुआ कैसे किस तरह जरा देखिए-रूपया 50000.00 प्रति माह वेतन, रूपया 45000.00 प्रति माह संसदीय क्षेत्र भत्ता, रूपया 15000.00 प्रतिमाह ऑफिस भत्ता, और रूपया 30000.00 प्रति माह सचिवायीय भत्ता( सेक्रेटेरियल असिस्टेंस के तौर पर) इसके अलावा संसद सत्र के दौरान हर सांसद को रूपया 2000.00 प्रतिदिन का भत्ता अनुमन्य होता है।यही नहीं 1 सासंद साल भर में 34 हवाई ट्रिप का रिंबर्स ले सकता है, जबकि रेल और सड़क यात्रा के तो असीमित भत्ते वो साल भर में ले सकता है। तो इस तरह सरकारी खर्चों का एक बड़ा हिस्सा हमारे सांसदों के यात्रा और दैनिक भत्तों के मद में ही खर्च होता है।हमारे सांसदों को इसके अलावा तमाम तरह के अन्य पर्क्स जैसे फ्री हाउसिंग फ्री वॉटर फ्री बिजली फ्री टेलीफोन फ्री मेडिकल ट्रीटमेंट भत्ते मिलते हैं जिनका संसद से मिलने वाले भत्तों के अतिरिक्त हैं। एकउदाहरण के तौर पर जून 2015 से जून 2016 के लिए बीजेपी के अंडमान निकोबार से सांसद विष्णुपद रे और केरल के एट्टिंगल से सीपीआई (एम) सांसद ए सम्पत ने 1-1 करोड़ के रिंबर्समेंट का क्लेम किया था, इसके अलावा 61 अन्य सांसदों ने भी 50 लाख से लेकर 1 करोड़ के बीच के रिंबर्समेंट के लिए क्लेम किया था। स्रोत- Compiled by PRS Legislative research from India, The Salary allowances and Pension of MPs (Amendment) Bill 2010, Amenities for MPs, Lok Sabha Secretariat.

वहीं इस मुद्दे पर आयकर के वरिष्ठ अधिवक्ता दिलीप यशवर्धन

ने बताया कि जब भारत का संविधान “हम भारत के लोग” के साथ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की बात करता है तो संवैधानिक पद पे बैठे लोग उसको नज़र अंदाज़ क्यों करते है l क्या सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का मतलब एक वर्ग को एकदम नज़रंदाज़ करना है या सरकारी खजाने को राजनीतिक लाभ के लिए मुफ्त बाँट देना है l इस देश में लगभग 5 प्रतिशत से भी कम लोग इनकम टैक्स देते है जिनसे जरुरतमंदो की सहयता करना तो एक हद तक ठीक हो सकता है लेकिन वोट बैंक के लिए मुफ्तखोरी की आदत डलवाना कही से भी सार्थक नहीं और अगर मुफ्त बाटना ही है तो उसमे क्यों नहीं राजनेताओं की भागीदारी होती है वो जनता के ही पैसे पर सारी ऐश करते है, कर मुक्त वेतन भी लेते है और तमाम करमुक्त सुविधाओं का लाभ भी लेते है, अगर सरकारी नौकरी करने वाला चपरासी भी करमुक्ति की सीमा पार कर लेता है तो आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उसे भी टैक्स देना पड़ता है लेकिन एक बार राजनीतिक पद पा जाने वाला व्यक्ति चाहे लाखो रूपये सालाना सरकार के खजाने से लेता हो लेकिन वो कर मुक्त होता है l  क्या सरकार को इनपर टैक्स लगा के इन्हें भी धन्यवाद का पात्र नहीं बनाना चाहिए।
ये बस इस देश के तमाम मध्यम और अति मध्यम वर्ग के दिल की आवाज़ है जिन्होंने शब्दों का रूप लिया है वो भी इस उम्मीद पर कि शायद शब्दों में छुपा दर्द सरकार के दिल तक पहुच पाए !
टीम जनआवाज़।

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